मनोरंजन या मानसिक प्रताड़ना? फिल्मों और गानों में महिलाओं के गलत चित्रण पर मेरी राय

रीडिंग टाइम: सिर्फ 2 मिनट

मैं सच में थक चुकी हूँ ये सब देखकर। आजकल लगभग हर दूसरी मूवी, सीरीज या गाने में औरतों को ही सबसे ज़्यादा टारगेट किया जाता है।

कहीं उसका रेप दिखाया जाएगा… कहीं उसे बेच दिया जाएगा… कहीं उसके शरीर के टुकड़े दिखाए जाएंगे… कहीं उसे टॉर्चर किया जाएगा… और कहीं उसे सिर्फ “entertainment” के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

गानों की कड़वी हकीकत

गानों में भी क्या दिखाते हैं? दस आदमी खड़े होंगे… बीच में एक लड़की को छोटे कपड़ों में ऐसे दिखाया जाएगा जैसे वो इंसान नहीं, कोई object हो। ऊपर से गंदे लिरिक्स, डबल मीनिंग बातें, और हर चीज़ में औरत को ही नीचे दिखाना।

सबसे दुख की बात क्या है? हम लड़कियां भी ये सब देखती हैं… मैं भी कभी-कभी देख लेती हूँ। लेकिन फिर सोचती हूँ — आखिर क्यों? जब गलत हमारे साथ हो रहा है, तो हम ही ऐसी चीज़ों को सपोर्ट क्यों करें?

समाज पर इसका असर

हर दिन न्यूज़ में क्या आता है? रेप, किडनैपिंग, हैरासमेंट, मर्डर। और फिल्मों में भी सबसे ज़्यादा दर्द किसका दिखाया जाता है? लड़कियों का।

मुझे सबसे ज़्यादा तकलीफ तब होती है जब गालियों में भी औरतों को इस्तेमाल किया जाता है। ज़्यादातर गालियाँ औरतों के नाम पर ही क्यों होती हैं? जो आदमी ऐसी गालियाँ देता है, क्या उसके घर में माँ-बहन नहीं होतीं? क्या औरत सिर्फ इंसल्ट करने की चीज़ है?

निष्कर्ष: मनोरंजन के नाम पर इंसानियत खत्म मत करो। महिलाओं को ऑब्जेक्ट बनाना और हिंसा को ‘कूल’ दिखाना बंद करो। मेंटल पीस भी कोई चीज़ होती है।

आज का सवाल: क्या आपको भी लगता है कि आज का सिनेमा महिलाओं के प्रति हिंसा को सामान्य बना रहा है? अपनी राय कमेंट्स में ज़रूर साझा करें। 👇

1 thought on “मनोरंजन या मानसिक प्रताड़ना? फिल्मों और गानों में महिलाओं के गलत चित्रण पर मेरी राय”

  1. आपकी बातों में बहुत दर्द, सच्चाई और संवेदनशीलता है। 🌿
    आज के समय में कई लोग अंदर ही अंदर यही सब महसूस करते हैं, लेकिन इतनी ईमानदारी से कह नहीं पाते। आपने बहुत जरूरी मुद्दे को आवाज़ दी है।

    Entertainment के नाम पर जब हिंसा, objectification और vulgarity को “normal” बना दिया जाता है, तो उसका असर सिर्फ स्क्रीन तक सीमित नहीं रहता — धीरे-धीरे वह सोच और व्यवहार में भी उतरने लगता है। सबसे दुखद बात यही है कि इंसान की संवेदनाएँ धीरे-धीरे सुन्न होने लगती हैं।

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