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“मनोरंजन के नाम पर महिलाओं की बेइज्जती, हिंसा और दर्द को सामान्य मत बनाओ।”
शायद मैं बहुत सेंसिटिव हूँ… लेकिन सच कहूँ तो आजकल कुछ मूवीज और सीरीज देखकर मन बहुत परेशान हो जाता है। हर जगह हिंसा, गाली-गलौज, मर्डर और टॉर्चर जैसी चीज़ें दिखाई जाती हैं।
क्या हम हिंसा के आदी हो रहे हैं?
जब हम बार-बार स्क्रीन पर हिंसा और महिलाओं के प्रति अपमानजनक व्यवहार देखते हैं, तो धीरे-धीरे हमारा दिमाग इसे ‘नॉर्मल’ मानने लगता है। यही सबसे बड़ा खतरा है।
अगर लोग ऐसी चीज़ें देखना कम कर दें, तो धीरे-धीरे ऐसी चीज़ें बनना भी कम हो जाएंगी। क्योंकि जो बिकता है, वही बनाया जाता है। अगर हम अच्छे कंटेंट को सपोर्ट करेंगे, तो शायद समाज भी एक बेहतर दिशा में जाएगा।
मेरी प्रतिज्ञा
अब मैंने तय कर लिया है कि मैं ऐसी चीज़ें नहीं देखूँगी जो मेरे मन की शांति छीन लें। मेंटल पीस सबसे ऊपर है।
आज का सवाल: क्या आपने कभी कोई फिल्म या सीरीज देखने के बाद बेचैनी महसूस की है? क्या हमें ऐसे कंटेंट का बहिष्कार करना चाहिए? कमेंट्स में बताएं। 👇
यह बेहद संवेदनशील, जागरूक और दिल से लिखा गया विचार है। आपने बहुत सादगी से एक ऐसी बात कही है जिसे आज बहुत लोग महसूस तो करते हैं, लेकिन शब्द नहीं दे पाते।
“मनोरंजन ऐसा भी हो सकता है जो दिल को शांति दे…” — यह पंक्ति विशेष रूप से बहुत सुंदर और गहरी लगी। सच में, हर चीज़ जो हम लगातार देखते और सुनते हैं, उसका असर हमारे मन और सोच पर पड़ता है। ऐसे में अपने मानसिक संतुलन और शांति को प्राथमिकता देना बहुत समझदारी की बात है।