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मेरी सबसे बड़ी चुनौती — खुद को रोज़ खोते जाना

मेरी सबसे बड़ी चुनौती — खुद को रोज़ खोते जाना

Daily writing prompt
What are your biggest challenges?

एक सवाल, जिसने मुझे भीतर से तोड़ दिया… और फिर चुपचाप जोड़ भी दिया

कभी-कभी ज़िंदगी हमें ज़ोर से नहीं तोड़ती।
वो बस हमें हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा थका देती है।
इतना कि हम मुस्कुराते रहते हैं,
और अंदर से रोना हमारी आदत बन जाती है।

जब मुझसे पूछा गया —
“तुम्हारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?”
तो मैं कुछ देर चुप रही।

क्योंकि जवाब आसान नहीं था।
और सच कहूँ तो…
जवाब से मैं खुद डरती थी।

गाड़ी सिर्फ़ मशीन नहीं होती, वो एक एहसास होती है


सब कुछ होते हुए भी एक अजीब-सा खालीपन

बाहर से देखने पर मेरी ज़िंदगी में कोई बहुत बड़ी कमी नहीं थी।
मैं ज़िंदा थी।
साँस ले रही थी।
ज़िम्मेदारियाँ निभा रही थी।
लोगों से बात कर रही थी।
मुस्कुरा भी रही थी।

लेकिन अंदर…
अंदर कुछ बहुत ज़ोर से टूट रहा था।

एक ऐसा खालीपन,
जिसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता।
एक ऐसा बोझ,
जिसे किसी से बाँटा नहीं जा सकता।

मैं खुद से रोज़ कहती थी —
“सब ठीक है।”
“मैं संभाल लूँगी।”
“और लोग इससे भी ज़्यादा झेल रहे हैं।”

पर सच यह था कि
मैं खुद को ही झुठला रही थी।


मेरी सबसे बड़ी चुनौती: खुद को पीछे छोड़ देना

आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ,
तो समझ आता है…

मेरी सबसे बड़ी चुनौती
ना कोई इंसान था,
ना कोई हालात,
ना कोई रिश्ता।

मेरी सबसे बड़ी चुनौती मैं खुद थी।

मैं हर किसी के लिए खड़ी रही…
पर खुद के लिए बैठ तक नहीं पाई।

मैं हर किसी की बात समझती रही…
पर अपनी बात सुनने का वक्त नहीं दिया।

मैं सबके दर्द में साथ देती रही…
पर जब मेरा दिल भारी होता था,
तो मैं खुद से ही कहती थी —
“चुप रहो, इतना भी कुछ नहीं हुआ।”


खुद पर शक — वो ज़हर जो धीरे-धीरे मारता है

मैंने कभी खुद को खुलकर जिया ही नहीं।
हर कदम पर डर।
हर फैसले पर शक।

“अगर मैं गलत निकली तो?”
“अगर लोग हँसेंगे तो?”
“अगर मैं हार गई तो?”

ये सवाल इतने आम हो गए कि
मुझे लगा यही ज़िंदगी है।

मुझे यह एहसास ही नहीं हुआ कि
मैं खुद की सबसे बड़ी दुश्मन बन चुकी हूँ।

मैंने अपने सपनों को टालना सीख लिया।
अपने मन को दबाना सीख लिया।
और अपनी आवाज़ को धीमा करना सीख लिया।


चुप रहने की आदत — जो भीतर से खोखला कर देती है

मैं बहुत समय तक चुप रही।
इसलिए नहीं कि मुझे दर्द नहीं था…
बल्कि इसलिए कि
मुझे डर था कि अगर मैंने बोला,
तो कोई समझेगा ही नहीं।

मैंने खुद को मज़बूत दिखाने की कोशिश की।
पर सच्चाई यह है कि
हर बार चुप रहना ताक़त नहीं होता।

कई बार चुप रहना
बस मजबूरी होती है।
कई बार यह सिर्फ़ थक जाने का सबूत होता है।

मैं रात को अकेले रोती थी,
और सुबह वही चेहरा पहन लेती थी —
“मैं ठीक हूँ।”


(एक खामोश सच…)

अगर सच कहूँ…
तो मुझे सबसे ज़्यादा डर
अपने आँसुओं से नहीं लगता था।

मुझे डर लगता था इस बात से कि
कहीं कोई उन्हें
समझ ही न पाए।


वो एक सवाल, जिसने मुझे हिला दिया

एक दिन…
बस एक दिन…

मैं खुद से यह नहीं कह पाई कि
“सब ठीक है।”

मैंने पहली बार खुद से पूछा —
“क्या तुम सच में ठीक हो?”

और उस सवाल ने मुझे
अंदर तक हिला दिया।

क्योंकि जवाब था —
नहीं।

मैं ठीक नहीं थी।
मैं थक चुकी थी।
मैं खुद को खो चुकी थी।
और सबसे दुख की बात…
मुझे यह पता ही नहीं था कि कब।


खुद को स्वीकार करना — सबसे दर्दनाक सच

खुद को स्वीकार करना आसान नहीं होता।
इसका मतलब है यह मान लेना कि
आप कमजोर भी हैं,
डरे हुए भी हैं,
और थके हुए भी।

मैंने पहली बार अपने आँसुओं को रोका नहीं।
मैंने पहली बार खुद से भागा नहीं।
मैंने पहली बार यह माना कि
मुझे भी सहारे की ज़रूरत है।

और यहीं से
मेरी सबसे बड़ी चुनौती
मेरी सबसे बड़ी सीख बन गई।


आज भी डर है… लेकिन अब मैं खुद के साथ हूँ

मैं यह नहीं कहूँगी कि
अब सब आसान हो गया है।

आज भी डर लगता है।
आज भी मन भारी होता है।
आज भी कभी-कभी लगता है
कि मैं बहुत अकेली हूँ।

लेकिन फर्क यह है कि
अब मैं खुद को
बीच रास्ते में छोड़कर नहीं भागती।

अब मैं खुद से कहती हूँ —
“तुम थकी हो, और यह ठीक है।”
“तुम रो सकती हो।”
“तुम धीरे चल सकती हो।”


अगर तुम यह पढ़कर रो रही हो…

तो एक बात जान लो —
तुम कमजोर नहीं हो।

तुम बस बहुत समय से
खुद को समझने की कोशिश नहीं कर पाईं।

शायद तुम्हारी सबसे बड़ी चुनौती भी
मेरी जैसी ही है।

और अगर ऐसा है…
तो भरोसा रखो।

जिस दिन तुम खुद का हाथ थाम लोगी,
उस दिन ज़िंदगी की कोई भी चुनौती
तुम्हें तोड़ नहीं पाएगी।

Late Night Chats: जब ‘Good Night’ के बाद भी दिल पूरी रात जागता रहता है

आख़िर में…

अगर तुम चाहो…
तो comment में बस इतना लिख देना —
“मैं समझ रही हूँ।”

कभी-कभी
इतना कहना भी
किसी के लिए

जब प्यार एकतरफ़ा रह जाता है, और दिल टूटकर भी उम्मीदों से बाहर नहीं आ पाता