पढ़ने और लिखने के लिए मेरी परफेक्ट जगह

पढ़ने और लिखने की परफेक्ट जगह
अगर मुझे अपनी पढ़ने और लिखने की परफेक्ट जगह बनाने का मौका मिले, तो सबसे पहले मैं यह तय करूँगा कि वह जगह शोर से दूर हो। ऐसी जगह जहाँ शब्दों को ज़बरदस्ती खींचना न पड़े, जहाँ विचारों को आवाज़ लगाने की ज़रूरत न हो, बल्कि वे खुद-ब-खुद मन में उतर आएँ। मेरे लिए पढ़ना और लिखना सिर्फ एक आदत नहीं है, यह खुद से मिलने का एक तरीका है। और खुद से मिलने के लिए शांति सबसे ज़रूरी चीज़ है।
“शायद मैं अकेला नहीं हूँ जो ऐसी जगह का सपना देखता है।”
मेरा सपना है कि वह घर प्रकृति के बीच बसा हो। चारों तरफ हरियाली हो, दूर-दूर तक फैले पहाड़ हों और कहीं पास ही पहाड़ों से गिरता हुआ एक छोटा-सा झरना हो। उस झरने की आवाज़ बहुत तेज़ न हो, बस इतनी कि जब मैं लिखते-लिखते रुकूँ, तो वह आवाज़ मुझे याद दिलाए कि सब कुछ बह रहा है—समय भी, भावनाएँ भी, और मैं खुद भी।
घर बहुत बड़ा नहीं होगा। मुझे बड़े घरों से ज़्यादा अपनापन पसंद है। एक ऐसा घर जहाँ हर कोना जाना-पहचाना लगे, जहाँ दीवारें भी मेरी खामोशी समझती हों। लकड़ी की खिड़कियाँ हों, जिनसे सुबह की हल्की धूप अंदर आए और कमरे को धीरे-धीरे रोशन कर दे। सुबह का वक्त मेरा सबसे पसंदीदा समय होगा। जब सूरज उग रहा होगा और मैं अपने छोटे से गार्डन में बैठा होगा—हाथ में चाय का कप, सामने खुली किताब या खाली पन्ने।
उस गार्डन में ढेर सारे फूल होंगे। कुछ रंग-बिरंगे, कुछ सादे, कुछ शायद बिना नाम के। मुझे फूल इसलिए पसंद हैं क्योंकि वे बिना कुछ कहे बहुत कुछ सिखा जाते हैं—धैर्य, सुंदरता और चुपचाप खिलते रहने की कला। वहीं बैठकर मैं खुद को उगते हुए महसूस करना चाहता हूँ, जैसे हर सुबह मैं भी थोड़ा-सा नया हो जाता हूँ।
लिखते समय मुझे किसी परफेक्ट सेटअप की ज़रूरत नहीं होगी। न कोई महँगा टेबल, न कोई खास कुर्सी। बस एक साधारण-सी मेज़, एक आरामदायक कुर्सी और मेरे विचार। कभी-कभी मैं ज़मीन पर बैठकर भी लिखना चाहूँगा, पीठ दीवार से टिकाकर, सामने खुली खिड़की और बाहर बहती हवा। उस हवा में मिट्टी की खुशबू होगी, पेड़ों की सरसराहट होगी और कहीं दूर किसी पक्षी की आवाज़।
यह जगह मुझे रुकने की इजाज़त देगी। यहाँ मैं बिना किसी दबाव के लिख सकूँगा—बिना यह सोचे कि कौन पढ़ेगा, कौन समझेगा। यहाँ मेरी लिखाई सिर्फ मेरी होगी। कभी खुशी में डूबी हुई, कभी उदासी से भरी, कभी सवालों से भटकती हुई। और यही तो लिखने की असली खूबसूरती है—ईमानदारी।
शाम के वक्त मैं अक्सर किताब लेकर बाहर बैठना चाहूँगा। सूरज ढल रहा होगा, आसमान रंग बदल रहा होगा और मैं किसी और की कहानी में खोया हुआ होगा। शायद उसी समय मेरे अंदर कोई नई कहानी जन्म ले ले। मुझे लगता है, सबसे अच्छी कहानियाँ तभी आती हैं जब हम उन्हें ढूँढना छोड़ देते हैं।
रातें भी इस घर का एक खास हिस्सा होंगी। जब सब कुछ शांत हो जाएगा, झरने की आवाज़ और साफ़ सुनाई देगी और आसमान में चाँद अपनी पूरी रोशनी बिखेर रहा होगा। मैं अपने कमरे में लेटा हुआ, खिड़की से चाँद को देख सकूँगा। उस वक्त न कोई जल्दबाज़ी होगी, न कोई अधूरापन। अगर कोई विचार अधूरा रह भी जाए, तो मुझे पता होगा कि वह सुबह मेरा इंतज़ार कर रहा है।
यह जगह मुझे यह महसूस कराएगी कि मैं सुरक्षित हूँ—अपने विचारों के साथ, अपनी कमज़ोरियों के साथ, अपनी खामोशी के साथ। यहाँ मुझे किसी भूमिका में नहीं रहना होगा। न लेखक बनने का दबाव, न पाठक को खुश करने की ज़िम्मेदारी। बस मैं और मेरा मन।
मेरे लिए यह परफेक्ट स्पेस सिर्फ पढ़ने और लिखने की जगह नहीं होगी। यह एक ऐसा ठिकाना होगा जहाँ मैं थककर लौट सकूँ, जहाँ मैं खुद को समझ सकूँ, और जहाँ मैं बिना बोले भी बहुत कुछ कह सकूँ। यह जगह मुझे याद दिलाएगी कि धीमे चलना भी ज़िंदगी का एक खूबसूरत तरीका है।
शायद यही वजह है कि मैं इस जगह का सपना देखता हूँ। क्योंकि कभी-कभी हमें दुनिया से दूर नहीं जाना होता, बस खुद के थोड़ा और पास जाना होता है। और मेरे लिए, पढ़ने और लिखने की यह परफेक्ट जगह वही रास्ता होगी—खुद तक पहुँचने का।
“और आपकी परफेक्ट जगह कैसी होगी?”


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